NOIDA JOURNALIST PRAMOD DIXIT मथुरा। पुरुषोत्तम मास पर ब्रज की पावन चौरासी कोस परिक्रमा अंतिम चरण में पहुंच चुकी । लगभग एक माह तक चलने वाली यह आध्यात्मिक यात्रा 15 जून को पूर्णाहुति के साथ संपन्न । देश-विदेश से आए लाखों श्रद्धालु । ब्रजभूमि के प्रमुख धार्मिक स्थलों का दर्शन कर भक्ति, श्रद्धा और आध्यात्मिक ऊर्जा का किया अनुभव ।

ग्राम खाम्बी (खम्बवन) निवासी पंडित भगवत प्रसाद शर्मा ने परिक्रमा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि चौरासी कोस की परिक्रमा ब्रज संस्कृति और सनातन परंपरा का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। लगभग 252 किलोमीटर क्षेत्र में फैली इस परिक्रमा के दौरान श्रद्धालु मथुरा, वृन्दावन, गोवर्धन, बरसाना, नन्दगांव, गोकुल, राधाकुण्ड, श्यामकुण्ड, कामवन सहित अनेक प्रमुख लीलास्थलों का भ्रमण करते हैं।उन्होंने बताया कि यह परिक्रमा केवल धार्मिक यात्रा नहीं बल्कि आत्मशुद्धि और आत्मबोध का माध्यम भी मानी जाती है। श्रद्धालु इस यात्रा के दौरान राधा-कृष्ण की लीलाओं से जुड़ी पावन स्थलीयों के दर्शन कर आध्यात्मिक शांति और संतोष की अनुभूति प्राप्त करते हैं।पूरे परिक्रमा काल में ब्रज क्षेत्र भक्ति के रंग में रंगा रहा। विभिन्न स्थानों पर मंगला आरती, अखंड संकीर्तन, भागवत कथा, संत प्रवचन तथा भजन-कीर्तन के आयोजन हुए, जिनमें हजारों श्रद्धालुओं ने भाग लिया। ब्रजवासियों और सामाजिक संगठनों द्वारा श्रद्धालुओं के लिए जलसेवा, भंडारे, चिकित्सा सहायता और विश्राम की विशेष व्यवस्थाएं भी की गईं।परिक्रमा के दौरान दिव्यांग श्रद्धालुओं की सहभागिता विशेष आकर्षण का केंद्र रही। शारीरिक चुनौतियों के बावजूद उन्होंने पूरे उत्साह और दृढ़ संकल्प के साथ यात्रा में भाग लिया। उनकी आस्था और समर्पण ने अन्य श्रद्धालुओं को भी प्रेरित किया। यह दृश्य इस बात का प्रतीक बना कि ब्रज की यात्रा केवल शारीरिक क्षमता से नहीं बल्कि श्रद्धा और विश्वास से पूरी होती है।पंडित भगवत प्रसाद शर्मा ने कहा कि ब्रज संस्कृति में सेवा को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। यहां आने वाले प्रत्येक श्रद्धालु को ठाकुरजी का स्वरूप मानकर सेवा की जाती है। यही आत्मीयता, प्रेम और समर्पण ब्रजभूमि को विश्व के अन्य तीर्थस्थलों से अलग पहचान प्रदान करता है।उन्होंने कहा कि चौरासी कोस परिक्रमा का मूल संदेश प्रेम, भक्ति और सेवा के माध्यम से जीवन को सार्थक बनाना है। परिक्रमा पूरी होने के बाद श्रद्धालु अपने साथ केवल यादें ही नहीं बल्कि ब्रजरज की पवित्रता, राधा-कृष्ण के दिव्य प्रेम और आध्यात्मिक अनुभूति का अमूल्य अनुभव भी लेकर लौटते हैं।ब्रजभूमि, संत-महात्माओं, ब्रजवासियों और लाखों श्रद्धालुओं की निष्कलुष भक्ति को नमन करते हुए यह परिक्रमा एक बार फिर यह संदेश देती है कि प्रेम, श्रद्धा और भक्ति आज भी मानव जीवन की सबसे बड़ी शक्ति हैं। पुरुषोत्तम मास में आयोजित यह पावन यात्रा श्रद्धालुओं के लिए आध्यात्मिक ऊर्जा, सांस्कृतिक विरासत और सेवा भाव का अद्वितीय संगम बनकर उभरी है।
