फरवरी के पहले पखवाड़े की ताज़ी सुबह। सूर्य की रोशनी कई दिनों बाद चहक रही है लेकिन नोएडा सेक्टर- 1, दुर्गा सिनेमा जैसे एक व्यस्त चौराहे के बगल से जाने वाली सर्विस रोड पर गोल्डन कलर से रंगी हुई एक बग्घी उदास खड़ी है। बग्घी के ऊपर अलसाया हुआ पड़ा है उसका मालिक, आधा सोया आधा जागा हुआ। बग्घी से कुछ दूर पर, नगर निगम के लाइट पोल पर बंधे हैं दो सफेद घोड़े।
एक 6-7 साल का बच्चा घोड़ों को चारा लगाता हुआ दिखता है। आश्चर्य की बात यह कि बहुधा जिस घोड़े को संभालने के लिए बड़े बड़े उस्तादों के हाथ पैर फूल जाते हैं। वे घोड़े एक बच्चे से भी किस कदर दोस्त हो सकते हैं।

घोड़ों की सेहत, बच्चे की कमीज़, बग्घी पर आलस में पड़े हुए गाड़ीवाले का हुलिया कह रहा था कि शादियों के इस मौसम में भी काम अच्छा नहीं चला। क्या शादियों में बग्घियों का चलन कम हो जाएगा, क्या औद्योगीकरण खत्म कर देंगे घोड़ा गाड़ी की उपयोगिता, क्या घोड़े मध्यम शौकीनों लोगों की ज़रूरत से बाहर की चीज़ हो जाएंगे।
यदि हमें कुछ परंपराओं को प्रासंगिक बनाए रखना है तो उनके वाहकों को उचित मानदेय भी देना होगा।
उचित मानदेय मिलने से न केवल उनका जीवन यापन मानकीय स्तर का हो सकेगा बल्कि हम एक नैतिक और सामाजिक जिम्मेदारी में भागीदारी करके सामाजिक समता के उद्देश्य को भी आगे बढ़ा सकेंगे।