

नोएडा संवाददाता प्रमोद दीक्षित
कानपुर/नोएडा। मिश्रा और दुबे परिवार में आज एक अत्यंत पवित्र, सांस्कृतिक और भावनात्मक अवसर मनाया गया। परिवार के नन्हे सदस्य अविराज, जो स्वर्गीय राज कुमार मिश्रा के पौत्र और अनुराग मिश्रा के पुत्र हैं, का पारंपरिक अन्नप्राशन संस्कार (कानपुर में “पासनी”) पूरे वैदिक विधि-विधान के साथ सम्पन्न हुआ। पाँच माह के अविराज के इस संस्कार ने परिवार में उल्लास, उमंग और भावनाओं की नई धारा प्रवाहित की।
समारोह का सबसे भावुक क्षण वह रहा जब परिवार ने कहा कि
“यदि स्वर्गीय राज कुमार मिश्रा आज हमारे बीच होते, तो यह समारोह उनके लिए अपार संतोष और गर्व का अवसर होता।”
बाबा अयोध्या प्रसाद मिश्रा की गरिमामयी उपस्थिति ने बढ़ाई कार्यक्रम की शोभा
संस्कार की शालीनता और गरिमा में एक महत्वपूर्ण भूमिका परिवार के मुखिया अयोध्या प्रसाद मिश्रा की उपस्थिति ने निभाई। परिवार के वरिष्ठ सदस्य के रूप में उनकी सहभागिता ने पूरे आयोजन को परंपरा, अनुशासन और सांस्कृतिक मर्यादा से भर दिया।
परिवार के सदस्यों ने कहा कि उनकी उपस्थिति इस कार्यक्रम की सबसे बड़ी शक्ति और आशीर्वाद रही।
कार्यक्रम में उपस्थित परिवारजन
दादी: उषा मिश्रा
पिता: अनुराग मिश्रा
माता: दीप्ति मिश्रा
नाना: श्री कान्त दुबे
नानी: राधा दुबे
बुआ: रिंकी, नंदनी, रानी, अरुणा, सोनी, बब्ली,
फूफा: धर्मेद्र दीक्षित,मोहित तिवारी,
फूफा: बब्लू शुक्ला
कई मामा–मामी: जिन्होंने पूरे उत्साह से संस्कार में योगदान दिया
पूरे घर में उत्सव जैसा माहौल
अविराज के अन्नप्राशन के लिए घर को दुल्हन की भाँति सजाया गया था। रंग-बिरंगी सजावट, पुष्प-विन्यास, रोशनी और सांस्कृतिक तत्वों ने पूरे घर को उत्सव-स्थल में बदल दिया।
पूरे आयोजन का आध्यात्मिक केंद्र श्री रामचरितमानस का अखंड पाठ रहा। पाठ की दिव्य वाणी, वैदिक मंत्रोच्चार और सात्विक वातावरण ने कार्यक्रम को पावन ऊर्जा से भर दिया।
संस्कार का पावन क्षण
वैदिक विधि-विधान के बीच जब नन्हे अविराज को पहली बार अन्न ग्रहण करवाया गया, तो पूरे परिवार के चेहरे पर आनंद, भावुकता और आशीर्वाद की चमक साथ-साथ दिखाई दी। यह क्षण परिवार के लिए जीवनभर की अविस्मरणीय स्मृति बन गया।
परंपरा और संस्कार का जीवंत उत्सव
आयोजन में आए सभी रिश्तेदारों और अतिथियों के लिए विशेष प्रसाद, भोग और सत्कार की व्यवस्थाएँ की गईं। सभी ने अविराज के उज्ज्वल भविष्य और स्वस्थ जीवन की मंगलकामनाएँ व्यक्त कीं।
अन्नप्राशन का यह दिव्य आयोजन केवल एक धार्मिक संस्कार नहीं रहा—यह परिवार की परंपरा, आस्था, एकता और भावनात्मक बंधन का अद्भुत उत्सव बनकर उभरा।
आज का दिन मिश्रा और दुबे परिवार के इतिहास में एक सांस्कृतिक, पारिवारिक और भावनात्मक अध्याय बन गया।
